माता
प्रथम संस्कार
आर्ष विद्याकुलम्सा विद्या या विमुक्तयेशिक्षा-दृष्टि
ज्ञान से समझ, समझ से विवेक और विवेक से आचरण। शिक्षा मनुष्य को स्वयं, समाज और विश्व के प्रति उत्तरदायी बनाने की प्रक्रिया है।
प्राचीन भारतीय शिक्षा परंपरा
भारतीय शिक्षा की परंपरा में ज्ञान को जीवन का प्रकाश माना गया है। छात्र आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन, श्रवण, मनन और अभ्यास करता है। गुरुकुल या आचार्यकुल में विषय का ज्ञान और जीवन का आचरण परस्पर जुड़े रहते हैं।
पुस्तिका बालक और बालिका, दोनों के अध्ययन की परंपरा को स्थान देती है। विद्या का अवसर सामाजिक और आर्थिक भेदों से ऊपर उठकर सबके लिए हो—यह उसके प्रस्तुत शिक्षा-आदर्श का महत्वपूर्ण भाग है।
सीखने का क्रम
प्रथम संस्कार
जीवन का मार्गदर्शन
विवेक और अध्ययन
अध्ययन से आचरण
कौशल के साथ समझ और नागरिक चेतना का भी विकास।
ज्ञान, विवेक और जीवन के प्रश्नों की समझ।
समाज और विश्व में उत्तरदायी सहअस्तित्व।
कौशल, अभ्यास, स्वावलम्बन और उपयोगी कार्य।
शास्त्रकुलम् का अध्ययन-विस्तार
भाषा, पठन, लेखन और संस्कार। संस्कृत के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा से सीधा संवाद।
अतीत से वर्तमान का संवाद
पुस्तिका औपनिवेशिक शिक्षा-नीति, विशेषकर 1835 के बदलावों, के संदर्भ में शिक्षा के उद्देश्य पर प्रश्न उठाती है। उसका केंद्रीय प्रश्न है: क्या शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल धनार्जन हो सकता है? वेबसाइट पर यह संस्था के शैक्षिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत है।
आज की प्रतिस्पर्धा, करियर और सफलता की चर्चा के बीच मनुष्य, परिवार और समाज का प्रश्न भी साथ रहना चाहिए। आर्ष विद्याकुलम् ऐसी स्वदेशी शिक्षा-दृष्टि पर काम करने का आह्वान करता है जिसमें भारतीयता, स्वतंत्र चिंतन, समान अवसर और विश्वकल्याण साथ हों।
शोध और शिक्षा संवादसाथ मिलकर
अपना समय, ज्ञान या सहयोग शिक्षा के इस प्रयास से जोड़ें।